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बिहार में 'पिछड़ा वर्ग' की सियासत: सम्राट चौधरी के 'बलिदान' वाले बयान और लालू यादव पर तंज के मायने

बिहार में 'पिछड़ा वर्ग' की सियासत: सम्राट चौधरी के 'बलिदान' वाले बयान और लालू यादव पर तंज के मायने।।
​पटना/N5: बिहार की राजनीति में एक बार फिर 'पिछड़ा और अति पिछड़ा' कार्ड चरम पर है। बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के हालिया बयानों ने राज्य की राजनीतिक तपिश को और बढ़ा दिया है। एक तरफ जहां उन्होंने खुद को पिछड़ा समाज के अधिकारों के लिए पूरी तरह समर्पित बताया है, वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव पर तीखा हमला बोला है। 

ऐसे में यह सवाल उठना लाज़मी है कि यदि दोनों ही नेता पिछड़े समाज की बात करते हैं, तो उनके बीच की यह सियासी खाई इतनी गहरी क्यों है?

​सम्राट चौधरी का बड़ा दावा: "पिछड़े समाज के लिए बहा दूंगा खून"

​हाल ही में एक सार्वजनिक मंच से बोलते हुए सम्राट चौधरी ने पिछड़ा वर्ग को सत्ता की असली चाबी बताया। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि पिछड़ा समाज जिसे चाहेगा, वही बिहार की गद्दी पर बैठेगा। उन्होंने अति पिछड़ा वर्ग (EBC) को सुरक्षा और अधिकार दिलाने का पक्का भरोसा देते हुए कहा कि बिहार की खुशहाली और उनके हक के लिए सम्राट चौधरी अपना खून बहाने (जान देने) को भी तैयार है।

​लालू परिवार की सुरक्षा और 'खलनायक' वाले बयान पर रार।।

​सम्राट चौधरी ने सिर्फ अपनी प्रतिबद्धता ही नहीं जताई, बल्कि लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार को भी आड़े हाथों लिया। लालू यादव की सुरक्षा में कटौती के आरोपों पर पलटवार करते हुए उन्होंने दावा किया कि लालू जी और उनके परिवार की सुरक्षा में आज भी करीब 150 सिपाही तैनात हैं। इसके साथ ही उन्होंने लालू यादव की राजनीतिक शैली पर निशाना साधते हुए उन्हें 'खलनायक' तक कह डाला।

​बड़ा सवाल: अगर दोनों पिछड़ों के हमदर्द, तो फिर इतनी कड़वाहट क्यों?

​इस पूरे घटनाक्रम के बाद राजनीतिक गलियारों में एक गंभीर बहस छिड़ गई है। सवाल यह है कि लालू प्रसाद यादव, जिन्हें बिहार में दशकों से पिछड़े और वंचित समाज की आवाज और उनका 'धरोहर' माना जाता रहा है, उनके प्रति सम्राट चौधरी के मन में इतनी राजनीतिक कड़वाहट क्यों है? इसके पीछे के मुख्य राजनीतिक और रणनीतिक कारण निम्नलिखित हैं:

​राजनीतिक विरासत की लड़ाई: लालू प्रसाद यादव ने 90 के दशक में 'मंडल आंदोलन' के दौर में पिछड़ों को आवाज दी। वहीं, सम्राट चौधरी आज के दौर में उसी वोट बैंक (विशेषकर अति पिछड़ा और लव-कुश समीकरण) को भाजपा और एनडीए (NDA) के पाले में लाने की कोशिश कर रहे हैं। यह लड़ाई असल में इस बात की है कि पिछड़ों का असली हितैषी कौन है।

​'जाति' बनाम 'विकास और कानून व्यवस्था': एनडीए और सम्राट चौधरी का आरोप रहता है कि लालू यादव के दौर में पिछड़ों के नाम पर केवल एक खास परिवार और कुछ सीमित लोगों का फायदा हुआ, जिसे वे 'जंगलराज' या परिवारवाद का नाम देते हैं। सम्राट चौधरी का तर्क है कि वे पूरे समाज को सुरक्षा और वास्तविक हिस्सेदारी देना चाहते हैं, न कि किसी एक परिवार को।

​वोट बैंक की गोलबंदी: बिहार में अति पिछड़ा (EBC) और पिछड़ा (OBC) वर्ग आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा हैं। सम्राट चौधरी जानते हैं कि जब तक लालू यादव की 'पिछड़ा नेता' वाली छवि पर प्रहार नहीं किया जाएगा, तब तक इस मजबूत वोट बैंक में पूरी तरह सेंध लगाना नामुमकिन है।

​निष्कर्ष: बिहार की राजनीति का यह अध्याय दिखाता है कि अब लड़ाई 'अगड़ा बनाम पिछड़ा' की नहीं, बल्कि 'पिछड़ा बनाम पिछड़ा' की हो चुकी है। सम्राट चौधरी का "जान दे देने" का वादा और लालू यादव को "खलनायक" बताना, दोनों ही बातें आगामी चुनावों के लिए बिछाई जा रही बिसात का हिस्सा हैं। जनता को तय करना है कि वह लालू यादव के पुराने सामाजिक न्याय के दौर पर भरोसा कायम रखती है या सम्राट चौधरी के नए दावों और 'फर्म गारंटी' के साथ जाती है।
Shailendra Kumar
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