ओड़िशा: पुरी के 'ब्लू फ्लैग' बीच पर पहली बार गूंजी नन्हें मेहमानों की किलकारी, सैकड़ों ओलिव रिडले कछुए समुद्र में समाए।।

ओड़िशा: पुरी के 'ब्लू फ्लैग' बीच पर पहली बार गूंजी नन्हें मेहमानों की किलकारी, सैकड़ों ओलिव रिडले कछुए समुद्र में समाए।।

​पुरी, 21 मार्च 2026: ओड़िशा के पर्यावरण संरक्षण के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया है। पवित्र नगरी पुरी के प्रतिष्ठित 'ब्लू फ्लैग' (Blue Flag) प्रमाणित गोल्डन बीच पर पहली बार ओलिव रिडले (Olive Ridley) कछुओं के अंडों से सैकड़ों बच्चे निकलकर सुरक्षित रूप से बंगाल की खाड़ी में समा गए।

​आमतौर पर ओड़िशा के गंजम और केंद्रपाड़ा जिलों के तटों पर ही इन कछुओं का प्रजनन देखा जाता है, लेकिन पुरी के मुख्य पर्यटन तट पर इस घटना ने वन्यजीव विशेषज्ञों और पर्यटकों को सुखद आश्चर्य में डाल दिया है।

​बीते गुरुवार, 19 मार्च को सूर्यास्त के समय, रेत के नीचे दबे अंडों से नन्हें कछुए बाहर निकलने शुरू हुए। वन विभाग के अधिकारियों की मौजूदगी में इन कछुओं ने समुद्र की लहरों की ओर अपना सफर शुरू किया। विशेषज्ञों के अनुसार, लगभग 45 से 50 दिन पहले मादा ओलिव रिडले कछुओं ने यहाँ सुरक्षित रूप से अंडे दिए थे।

वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, "पुरी जैसे व्यस्त तट पर कछुओं का प्रजनन करना यह साबित करता है कि यहाँ का पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) अब समुद्री जीवों के लिए पूरी तरह अनुकूल और सुरक्षित हो गया है। प्रदूषण और रोशनी के नियंत्रण ने इन दुर्लभ कछुओं को यहाँ आकर्षित किया है।"

पुरी 'ब्लू फ्लैग' बीच पर पहली बार सामूहिक निकास

​ओडिशा का तट ओलिव रिडले (Olive Ridley) कछुओं के प्रजनन के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है, लेकिन आमतौर पर ये कछुए गंजम के ऋषिकुल्या (Rushikulya) या केंद्रपाड़ा के गहिरमाथा (Gahirmatha) तटों पर भारी संख्या में आते हैं।
​नया रिकॉर्ड: यह पहली बार है जब पुरी के 'ब्लू फ्लैग' प्रमाणित बीच पर कछुओं के बच्चों (hatchlings) का इस तरह सामूहिक रूप से समुद्र की ओर जाते हुए देखा गया है।
​प्रक्रिया: लगभग 45-50 दिन पहले (फरवरी के अंत या मार्च की शुरुआत में) मादा कछुओं ने यहाँ अंडे दिए थे। अब उन अंडों से बच्चे निकलकर प्राकृतिक रूप से समुद्र की ओर बढ़ रहे हैं।

​'ब्लू फ्लैग' बीच का महत्व और मतलब 

​किसी बीच को 'ब्लू फ्लैग' प्रमाणन तब मिलता है जब वह स्वच्छता, सुरक्षा और पर्यावरणीय मानकों पर खरा उतरता है।
​संरक्षण की सफलता: पुरी बीच पर कछुओं का आना यह दर्शाता है कि यहाँ का पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) अब कछुओं के लिए सुरक्षित और अनुकूल हो गया है।
​प्रदूषण मुक्त वातावरण: कछुए अक्सर रोशनी और शोर से विचलित हो जाते हैं, लेकिन इस बीच पर सख्त नियमों के कारण उन्हें एक शांत वातावरण मिला।

ओलिव रिडले कछुओं का जीवन चक्र

​ओलिव रिडले दुनिया के सबसे छोटे समुद्री कछुओं में से एक हैं और इन्हें 'Arribada' (स्पेनिश शब्द, जिसका अर्थ है 'आगमन') के लिए जाना जाता है, जहाँ हज़ारों मादाएँ एक साथ अंडे देने आती हैं।
​प्राकृतिक नेविगेशन: ये कछुए अपनी जन्मस्थली को याद रखते हैं और वर्षों बाद प्रजनन के लिए उसी तट पर वापस आते हैं।
​खतरा और सुरक्षा: ये कछुए 'वन्यजीव संरक्षण अधिनियम' के तहत संरक्षित हैं। समुद्र में जाते समय ये अक्सर पक्षियों और कुत्तों का शिकार बन जाते हैं, इसलिए वन विभाग और स्थानीय स्वयंसेवक इनकी सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।

ओलिव रिडले कछुए 'वन्यजीव संरक्षण अधिनियम' के तहत लुप्तप्राय श्रेणी में आते हैं। अंडों से निकलने के बाद इन बच्चों को समुद्री पक्षियों और आवारा कुत्तों से बचाने के लिए वन विभाग और स्थानीय स्वयंसेवकों ने विशेष जालीदार घेरे बनाए थे। समुद्र तक के उनके रास्ते को बाधा मुक्त रखा गया ताकि वे प्राकृतिक रूप से पानी तक पहुँच सकें।

सोशल मीडिया पर 'SansadTV' और स्थानीय प्रशासन द्वारा साझा किए गए वीडियो ने प्रकृति प्रेमियों का ध्यान खींचा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह सिलसिला जारी रहा, तो भविष्य में पुरी का यह तट भी गहिरमाथा और ऋषिकुल्या की तरह ओलिव रिडले कछुओं के प्रमुख प्रजनन केंद्र के रूप में उभर सकता है।

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