ऐसी ख़बर है कि आरटीआई से पता चला है कि वर्ष 2005 से 2025 तक भारत में 200 बाघों का शिकार हुआ है ।
ऐसी
ख़बर है कि आरटीआई से पता चला है कि वर्ष 2005 से 2025 तक भारत में 200 बाघों का
शिकार हुआ है ।
टाइम्स
ऑफ इंडिया का एक समाचार लेख के अनुसार जो भारत में बड़े बिल्लियों (बाघ और तेंदुए)
के शिकार के बारे में RTI से मिली
जानकारी पर आधारित है। 2005 से दिसंबर 2025 तक भारत में 200 बड़े बिल्लियों का
शिकार हुआ, जिसमें मध्य भारत सबसे बड़ा हॉटस्पॉट रहा। कुल 108 बाघों के मामले दर्ज
हुए, जिनमें सबसे ज्यादा 36 मध्य प्रदेश में, उसके बाद उत्तर प्रदेश (14) और
कर्नाटक (13) तेंदुए का शिकार दर्ज किया गया, जिसमें हिमाचल प्रदेश में सबसे
ज्यादा 21 मामले। अन्य राज्य जैसे आंध्र प्रदेश (8), जम्मू-कश्मीर (6) और उत्तर
प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु (प्रत्येक में 5) शामिल हैं।
वन्यजीव
विशेषज्ञ डॉ. वाई.वी. झाला ने कहा कि ये आंकड़े चिंताजनक हैं क्योंकि जब्ती केवल
छोटा हिस्सा है, और अंतरराष्ट्रीय बाजार (चीन, दक्षिण-पूर्व एशिया) में अंगों की
मांग बनी हुई है। यह शिकार बाघों की आबादी पर असर डाल सकता है, खासकर झारखंड,
छत्तीसगढ़, ओडिशा और पूर्वोत्तर राज्यों में।
भारत
में बाघों के संरक्षण की निगरानी करने वाली संस्था राष्ट्रीय बाघ संरक्षण
प्राधिकरण (NTCA) के आंकड़ों के अनुसार, पिछले दो
दशकों में बाघों की मृत्यु की संख्या ‘200’ के आंकड़े से कहीं अधिक है।
विभिन्न
RTI और NTCA की
रिपोर्टों के अनुसार, पिछले 20 वर्षों में भारत में 2,000 से अधिक बाघों की मृत्यु
दर्ज की गई है।
यह
सच है कि सैकड़ों बाघों का अवैध शिकार (Poaching)
हुआ है, लेकिन केवल ‘200’ का आंकड़ा कम लग रहा है। अकेले 2012 से 2023 के बीच ही
लगभग 1,300 से अधिक बाघों की मौत हुई, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा अवैध शिकार और
अंगों की जब्ती का था।
भले
ही शिकार एक बड़ी चुनौती है, लेकिन भारत ने बाघों के संरक्षण में शानदार सफलता भी
पाई है। ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ के प्रभावी कार्यान्वयन के कारण भारत में बाघों की
आबादी बढ़ी है।
वर्ष
बाघों की अनुमानित संख्या
2006
1,411
2014
2,226
2022
3,167 – 3,682
भारत
में लगभग 3,600 बाघ हैं, जो दुनिया की कुल बाघ की आबादी का लगभग 75% है। एक अन्य
आकलन के अनुसार, भारत के बाघ क्षेत्रों में लगभग 13,800 तेंदुए निवास करते हैं।
यह
बात बिल्कुल सही है। वन्यजीव विशेषज्ञों और संरक्षण संस्थाओं (जैसे TRAFFIC
और
EIA) का मानना है कि भारत में बाघों और तेंदुओं के
अवैध शिकार का सबसे बड़ा कारण चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया में इनकी भारी मांग है।
चीन
में सदियों पुरानी मान्यताओं के अनुसार, बाघ के शरीर का लगभग हर हिस्सा औषधीय
गुणों से भरपूर माना जाता है। हालांकि विज्ञान ने इसे कभी प्रमाणित नहीं किया, फिर
भी वहां का काला बाजार इन पर निर्भर है:
माना
जाता है कि बाघ की हड्डियों से बनी ‘टाइगर बोन वाइन’ या पाउडर गठिया (Arthritis)
और
शरीर की कमजोरी को दूर करता है। बाघ के पंजे, दांत और यहाँ तक कि आंखों का
इस्तेमाल विभिन्न रोगों के इलाज और ‘शक्तिवर्धक’ दवाओं के रूप में किया जाता है।
चीन
के अमीर तबके में बाघ और तेंदुए की खाल का होना सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना
जाता है। इनका उपयोग घरों में सजावट (Rug) के रूप में
या महंगे कोट बनाने में किया जाता है। बाघ के दांतों और नाखूनों को सोने में
जड़वाकर ताबीज या गहनों की तरह पहना जाता है।
चीन
में ‘टाइगर फार्म्स’ (जहाँ बाघों को पाला जाता है) मौजूद हैं। चीन का तर्क है कि
इससे जंगली बाघों का शिकार कम होगा, लेकिन इसके उलट। इन फार्म्स ने बाघ के अंगों
की मांग को जिंदा रखा है। जो जंगली बाघ के अंगों को “अधिक शक्तिशाली” और “असली”
मानकर ब्लैक मार्केट में उनकी ऊंची कीमत वसूली का पनाहगार है।
यह
ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि शिकार की घटनाओं में कमी आई है, लेकिन पूरी तरह से
रोकथाम अभी भी एक चुनौती है। सरकार अब “स्मार्ट गश्त” (M-STrIPES)
और
ड्रोन जैसी तकनीकों का उपयोग कर रही है।
भारत
में वन्यजीव अपराधों को रोकने और अंतरराष्ट्रीय तस्करी नेटवर्क को तोड़ने के लिए WCCB
(Wildlife Crime Control Bureau) यानी ‘वन्यजीव अपराध नियंत्रण
ब्यूरो’ एक केंद्रीय नोडल एजेंसी के रूप में काम करता है। यह संस्था सीधे
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन आती है।
